Excise Policy Case: दिल्ली आबकारी नीति घोटाला मामले में राजनीतिक और कानूनी हलचल तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बाद अब आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी दिल्ली हाईकोर्ट में पेश न होने का फैसला किया है।
मनीष सिसोदिया ने इस संबंध में न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे न तो स्वयं अदालत में उपस्थित होंगे और न ही उनकी ओर से कोई वकील बहस करेगा। उनके इस फैसले को केस में एक बड़ा राजनीतिक और कानूनी कदम माना जा रहा है।
न्याय पर भरोसे को लेकर सवाल
अपने पत्र में सिसोदिया ने निष्पक्ष सुनवाई को लेकर गंभीर आशंकाएं जताई हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें अब इस मामले में न्याय की उम्मीद नहीं बची है और वे “सत्याग्रह” के रास्ते को अपना रहे हैं।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वे अदालत की कार्यवाही से खुद को अलग कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें मौजूदा प्रक्रिया में निष्पक्षता पर भरोसा नहीं है।
केजरीवाल पहले ही कर चुके हैं समान घोषणा
इससे पहले अरविंद केजरीवाल ने भी इसी मामले में चार पन्नों का पत्र लिखकर कहा था कि वे न तो स्वयं अदालत में पेश होंगे और न ही कोई वकील उनकी ओर से बहस करेगा। उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह का हवाला देते हुए इसे नैतिक निर्णय बताया था।
पूरा मामला क्या है?
यह मामला दिल्ली आबकारी नीति से जुड़ा है, जिसमें सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें केजरीवाल समेत 23 आरोपियों को बरी कर दिया गया था।
इस अपील पर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा कर रही हैं।
कोर्ट में पहले भी उठ चुकी है आपत्ति
अरविंद केजरीवाल ने 13 अप्रैल को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होकर न्यायमूर्ति शर्मा से खुद को मामले से अलग करने की मांग की थी। हालांकि, 20 अप्रैल को कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी और कहा था कि किसी भी पक्ष को न्यायपालिका पर अविश्वास फैलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
राजनीतिक असर
लगातार दो बड़े नेताओं द्वारा अदालत से दूरी बनाने के फैसले ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है। अब यह केस सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक और संस्थागत बहस का केंद्र भी बनता जा रहा है।






