सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने सोमवार को दो सप्ताह में चौथी बार पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी की, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर मध्य पूर्व संघर्ष के प्रभाव को लेकर चिंताएं बढ़ गईं। पहली बार ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी मई के मध्य में हुई, जब इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम सहित रिफाइनरियों ने खुदरा कीमतों में 3% से अधिक की वृद्धि की। जो लगभग चार वर्षों में पहली बड़ी बढ़ोतरी थी। रॉयटर्स के अनुसार, महीने की शुरुआत से अब तक डीजल की कीमतों में कुल 8.6% और पेट्रोल की कीमतों में 7.8% की वृद्धि हुई है।
यह नवीनतम बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान को लेकर चिंताओं में कुछ कमी आई है और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे आ गई हैं।
सरकार का तर्क क्या रहता है?
भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। चूंकि भुगतान डॉलर में होता है, इसलिए रुपए के कमजोर होने पर आयात महंगा पड़ता है।
क्रूड ऑयल + रिफाइनिंग लागत + टैक्स = रिटेल प्राइस।
सरकार का कहना रहता है कि जब ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाता है, तब घरेलू कीमतों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।
फिर लोग सवाल क्यों उठाते हैं?
क्योंकि आंकड़े दूसरी तस्वीर भी दिखाते हैं।
- 2020 में क्रूड लगभग 20 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गया था, तब भी पेट्रोल कई जगह 70 रुपये प्रति लीटर से ऊपर रहा।
- 2022 में क्रूड 120 डॉलर तक पहुंचा तो पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर के पार चला गया, लेकिन बाद में क्रूड 75–80 डॉलर तक गिरने पर भी कीमतों में उसी अनुपात में कमी नहीं आई।
टैक्स का बड़ा हिस्सा
आज पेट्रोल की खुदरा कीमत में केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स का बड़ा हिस्सा शामिल होता है।
दिल्ली में पेट्रोल की कीमत में केंद्र की एक्साइज ड्यूटी और राज्य का VAT मिलाकर बड़ा टैक्स हिस्सा जुड़ता है, जबकि बेस प्राइस और डीलर कमीशन अपेक्षाकृत कम होते हैं।
तेल कंपनियों के मुनाफे
Indian Oil, BPCL और HPCL जैसी सरकारी तेल कंपनियों ने 2023-24 में रिकॉर्ड मुनाफा दर्ज किया। तीनों कंपनियों का संयुक्त लाभ 80,000 करोड़ रुपये से अधिक रहा।
इसी वजह से आलोचक सवाल उठाते हैं कि जब कंपनियां भारी मुनाफे में हैं, तब कीमतों में राहत सीमित क्यों रहती है।
विंडफॉल टैक्स पर बहस
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होता है, तब सरकार कई बार तेल कंपनियों पर विंडफॉल टैक्स लगाती है। आलोचकों का कहना है कि इसका फायदा उपभोक्ताओं तक पूरी तरह नहीं पहुंचता।
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असल खेल क्या माना जाता है?
एक्साइज ड्यूटी
2014 से 2022 के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी में भारी बढ़ोतरी की थी। हालांकि बाद में नवंबर 2021 और मई 2022 में इसमें कटौती भी की गई।
राज्यों का VAT
कई राज्य पेट्रोल-डीजल पर 25–30% तक VAT वसूलते हैं। इसलिए अलग-अलग राज्यों में कीमतों में बड़ा अंतर दिखाई देता है।
इलेक्शन फैक्टर
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कई बार चुनावी अवधियों में लंबे समय तक ईंधन की कीमतों में बदलाव नहीं होता, जबकि चुनाव के बाद तेजी से संशोधन देखने को मिलता है। हालांकि सरकारें इस आरोप को खारिज करती रही हैं।
“रुपया कमजोर है” वाला तर्क
2014 में डॉलर लगभग ₹60 के आसपास था और क्रूड करीब 108 डॉलर प्रति बैरल था।
2026 में डॉलर ₹84 के आसपास और क्रूड लगभग 82 डॉलर प्रति बैरल के करीब रहा।
यानी रुपए की कमजोरी से आयात लागत बढ़ी है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि टैक्स में बढ़ोतरी का असर भी खुदरा कीमतों पर उतना ही बड़ा रहा है।
बता दें कि जब क्रूड बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार का हवाला देकर कीमतें बढ़ाई जाती हैं, लेकिन जब क्रूड घटता है तो टैक्स, घाटा या कंपनियों की लागत का तर्क दिया जाता है।
यही वजह है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर बहस लगातार जारी रहती है।
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