Fanta Sugar Content in India: भारत में पैकेज्ड फूड और सॉफ्ट ड्रिंक्स पर चीनी, नमक और फैट की मात्रा को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। Reuters की जांच के मुताबिक, भारत में बिकने वाली Fanta में ब्रिटेन में बिकने वाले इसी ब्रांड के मुकाबले करीब तीन गुना ज्यादा चीनी है। वहीं भारत में कुछ ऐसे आर्टिफिशियल कलर भी इस्तेमाल होते हैं, जिनकी मौजूदगी पर यूरोप में पैकेजिंग पर प्रमुख स्वास्थ्य चेतावनी दी जाती है।
मामला सिर्फ Fanta तक सीमित नहीं है। भारत में चिप्स, बिस्किट, इंस्टेंट नूडल्स, मीठे पेय और दूसरे पैकेज्ड फूड पर सामने की तरफ स्पष्ट हेल्थ वार्निंग लगाने की कोशिश लंबे समय से चल रही है। लेकिन बड़ी खाद्य और पेय कंपनियों के विरोध के बाद इस प्रस्ताव को लेकर सरकार और FSSAI का रुख नरम पड़ गया।
Fanta में भारत और ब्रिटेन का अंतर
Reuters के मुताबिक, लंदन में बिकने वाली Fanta की एक कैन में 63 कैलोरी है। भारत में बिकने वाली Fanta में चीनी की मात्रा ब्रिटेन के संस्करण से करीब तीन गुना बताई गई है।
भारत में बिकने वाले संस्करण में एक कृत्रिम रंग भी इस्तेमाल होता है। यूरोप में इस तरह के रंगों वाले उत्पादों पर प्रमुख स्वास्थ्य चेतावनी की व्यवस्था है, जबकि भारत में इसकी जानकारी पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में दी जाती है।
यही अंतर भारत में उपभोक्ताओं को मिलने वाली जानकारी और दूसरे देशों में लागू नियमों को लेकर सवाल खड़े करता है।
Reuters India Company News Editor Aditya Kalra explains why Big Food in India has resisted efforts to mandate nutritional warnings on the front of packaged products https://t.co/3EDxgSA9Dr pic.twitter.com/sRTaekpRZ0
— Reuters (@Reuters) August 25, 2026
सरकार चाहती थी पैकेट के सामने ‘लाल चेतावनी’
भारत में FSSAI लंबे समय से Front-of-Pack Labelling (FOPL) पर काम कर रहा था। इसका उद्देश्य यह था कि अगर किसी पैकेज्ड फूड में चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा ज्यादा है, तो इसकी जानकारी पैकेट के सामने ही साफ दिखाई दे।
ऐसी व्यवस्था में उपभोक्ता को पैकेट पलटकर लंबी न्यूट्रिशन टेबल पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती। रंग या प्रतीक के जरिए तुरंत पता चल सकता है कि उत्पाद में किसी पोषक तत्व की मात्रा ज्यादा है।
लेकिन अगस्त में FSSAI ने रंगीन चेतावनी व्यवस्था से पीछे हटते हुए ब्लैक एंड व्हाइट न्यूट्रिशन टेबल का प्रस्ताव आगे बढ़ाया। नियामक ने तर्क दिया कि अंतरराष्ट्रीय मॉडल को भारत की भोजन संबंधी आदतों पर सीधे लागू करना आसान नहीं है।
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Coca-Cola, Nestle और PepsiCo ने क्यों किया विरोध?
Reuters ने 19 मार्च को FSSAI और खाद्य उद्योग के प्रतिनिधियों के बीच हुई बैठक की रिकॉर्डिंग और दस्तावेजों की समीक्षा की।
बैठक में Coca-Cola India की वरिष्ठ अधिकारी मिली भट्टाचार्य ने फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी को लेकर सवाल उठाए। उनका तर्क था कि केवल किसी प्रतीक या आइकन को पैकेट पर देखकर ऐसा जरूरी नहीं कि उपभोक्ता अपनी खाने की आदत बदल देगा।
उद्योग प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि सरकार को चेतावनी लेबल के बजाय पोर्शन कंट्रोल और उपभोक्ता जागरूकता पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि Coca-Cola की सहयोगी कंपनी Coca-Cola HBC यूरोप के करीब दो दर्जन बाजारों में ट्रैफिक-लाइट स्टाइल न्यूट्रिशन लेबल का इस्तेमाल करती है। Nestle भी ब्रिटेन में लंबे समय से इंटरप्रेटिव लेबलिंग का इस्तेमाल कर रही है।
80% पैकेज्ड फूड पर लग सकता है ‘रेड’ निशान
उद्योग के अनुमानों के मुताबिक भारत के 100 अरब डॉलर से ज्यादा के पैकेज्ड फूड और बेवरेज बाजार के करीब 80% उत्पाद हाई फैट, हाई शुगर या हाई सॉल्ट श्रेणी में आ सकते हैं।
इंडियन Food & Beverage Association के प्रतिनिधि दीपक जॉली ने बैठक में चिंता जताई कि अगर रंग आधारित चेतावनी प्रणाली लागू हुई तो बड़ी संख्या में उत्पादों के पैकेट पर लाल निशान दिखाई दे सकते हैं।
उद्योग संगठन ने यह सवाल भी उठाया कि अगर किसी नारियल पानी में प्राकृतिक रूप से चीनी मौजूद है, तो क्या उस पर भी ‘हाई शुगर’ चेतावनी लगाई जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI के रुख पर जताई नाराजगी
इस पूरे विवाद में अब सुप्रीम कोर्ट भी शामिल है। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की याचिका के बाद अदालत ने पैकेज्ड फूड पर स्पष्ट चेतावनी व्यवस्था पर विचार करने को कहा था।
अगस्त में अदालत ने FSSAI के रुख पर कड़ी नाराजगी जताई और सरकार को दो सप्ताह में अपना अंतिम फैसला अदालत के सामने रखने को कहा। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या नियामक पर कॉरपोरेट कंपनियों का दबाव है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि अगर सरकार और नियामक इस मुद्दे पर कार्रवाई नहीं करते हैं तो अदालत आगे निर्देश दे सकती है।
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सिर्फ Fanta नहीं, KitKat और Maggi भी चर्चा में
भारत और दूसरे देशों में एक ही ब्रांड के उत्पादों की रेसिपी अलग होने का मुद्दा भी इस विवाद के साथ सामने आया है।
Reuters के मुताबिक:
- भारत के स्टैंडर्ड KitKat में 4.5% कोको सॉलिड्स बताए गए हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया के संस्करण में मिल्क चॉकलेट में कम से कम 22% कोको है।
- भारत में बिकने वाले Maggi के सभी वेरिएंट में पाम ऑयल इस्तेमाल होता है।
- ब्रिटेन में कई Maggi वेरिएंट में सनफ्लावर ऑयल इस्तेमाल किया जाता है।
- ब्रिटेन में बिकने वाले कई Maggi पैकेट भारत में बने होते हैं, लेकिन उन पर हाई-सॉल्ट के लिए लाल फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल लगा होता है।
हालांकि, अलग-अलग देशों में रेसिपी अलग होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि भारत में बिकने वाला उत्पाद नियमों का उल्लंघन कर रहा है। कंपनियां स्थानीय नियमों, कीमत, उपलब्ध सामग्री और उपभोक्ताओं की पसंद के हिसाब से उत्पाद तैयार करती हैं।
भारत में बढ़ रही हेल्थ को लेकर चिंता
यह बहस ऐसे समय में हो रही है जब भारत में मोटापा और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों को लेकर चिंता बढ़ रही है। Reuters ने Lancet में प्रकाशित एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि 2050 तक करीब 45 करोड़ भारतीय ओवरवेट या मोटापे से प्रभावित हो सकते हैं।
सोशल मीडिया पर भी पैकेज्ड फूड के खिलाफ जागरूकता अभियान बढ़ रहे हैं। Food Pharmer के नाम से मशहूर रेवंत हिमतसिंगका जैसे इन्फ्लुएंसर भारत और विदेशों में बिकने वाले एक ही ब्रांड के उत्पादों की तुलना कर रहे हैं।
कंपनियों के लिए बड़ा सवाल: मुनाफा या पारदर्शिता?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पैकेट के सामने चेतावनी लगाने से उपभोक्ता को खरीदारी से पहले तुरंत जानकारी मिलती है। वहीं खाद्य कंपनियों का तर्क है कि केवल चेतावनी लेबल से खाने की आदतें बदलने की गारंटी नहीं है।
इस विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारतीय उपभोक्ता को चीनी, नमक और फैट की मात्रा की जानकारी पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में मिलनी चाहिए या सामने ही साफ चेतावनी के रूप में?
फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है और भारत में पैकेज्ड फूड की लेबलिंग का अंतिम मॉडल अभी तय नहीं हुआ है।
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