पिंडदान की थाली सजी है, लेकिन कौवे नहीं आए; कहां गए हमारे आंगन के ये साथी?

Crows During Pitru Paksha: आज सर्वपितृ अमावस्या है। घरों के आंगन और छतों पर पितरों के निमित्त भोजन रखा जा रहा है। कहीं चावल और खीर है, तो कहीं पूड़ी और उड़द की कचौड़ी। परिवार के लोग कौवों के आने का इंतजार कर रहे हैं। हिंदू धार्मिक परंपरा में श्राद्ध के दौरान कौवों को भोजन कराने का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि कौवे के माध्यम से पितरों तक भोजन पहुंचता है।

लेकिन जब थाली सजी हो, काफी देर तक इंतजार के बाद भी कोई कौवा दिखाई न दे, तो मन में सवाल उठता है- आखिर कौवे कहां गए?

बचपन की यादों में घरों की छतों और मुंडेरों पर कौवों की कांव-कांव आम बात हुआ करती थी। सुबह होते ही कौवे दिखाई देते थे और घरों के आसपास भोजन तलाशते नजर आते थे। पितृपक्ष के दिनों में भी उनके आने का इंतजार रहता था। आज भी कई परिवार इस परंपरा को निभाते हैं, लेकिन कुछ लोगों को अपने आसपास पहले की तुलना में कौवे कम दिखाई देने का अनुभव होता है।

कौवे और पितरों से जुड़ी है परंपरा

पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण के दौरान कौवों के लिए भोजन निकालना कई परिवारों की परंपरा का हिस्सा है। धार्मिक मान्यता में कौवे को पितरों से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि श्राद्ध की थाली से कौवे का भोजन ग्रहण करना लोगों के लिए आस्था और संतोष का विषय होता है।

बुजुर्गों से सुनी बातें आज भी लोगों को याद हैं। पहले घरों की छतों, आंगनों और मुंडेरों पर कौवों का दिखाई देना आम माना जाता था। कौवों की कांव-कांव घरों के आसपास के माहौल का हिस्सा थी। ऐसे में जब श्राद्ध के दिन कौवा नजर नहीं आता, तो लोगों को पुरानी यादों और परंपराओं के बदलने का एहसास होता है।

क्या सचमुच कम हो रही है कौवों की संख्या?

कौवों की घटती मौजूदगी को लेकर अक्सर चर्चा होती है। कई लोग दावा करते हैं कि पहले की तुलना में अब उनके आसपास कौवे कम दिखाई देते हैं। हालांकि, किसी इलाके में कौवों का कम नजर आना और उनकी कुल आबादी में गिरावट होना दो अलग-अलग बातें हैं।

State of India’s Birds के 2025 के अपडेट में घरेलू कौवे की आबादी के दीर्घकालिक रुझान में वृद्धि का अनुमान दर्ज किया गया, जबकि हालिया वार्षिक रुझान में गिरावट का संकेत मिला। इसलिए यह दावा कि पिछले दस वर्षों में कौवों की संख्या 70–80 प्रतिशत घट गई है, उपलब्ध आंकड़ों से प्रमाणित नहीं होता।

इसका मतलब यह भी नहीं है कि हर शहर और हर मोहल्ले में कौवों की संख्या समान है। स्थानीय स्तर पर उनकी मौजूदगी में बदलाव हो सकता है। इसके वास्तविक कारणों को समझने के लिए संबंधित क्षेत्र में पक्षियों की संख्या और पर्यावरण की स्थिति का अध्ययन जरूरी है।

ये भी पढ़ेंः बॉडी कैमरे, कड़ी निगरानी और भारी तैनाती… CJP प्रदर्शन से पहले दिल्ली में चप्पे-चप्पे पर पुलिस का पहरा

पेड़ों की कमी और बदलता शहरी वातावरण

शहरों में तेजी से बढ़ती इमारतें, कंक्रीट का विस्तार और पेड़ों की कटाई पक्षियों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर सकते हैं। पुराने पेड़ पक्षियों को बैठने, आराम करने और घोंसले बनाने के लिए जगह देते हैं। जब हरियाली कम होती है और खुली जगहों पर इमारतें बन जाती हैं, तो पक्षियों के रहने का वातावरण भी बदलता है।

पीपल, बरगद और नीम जैसे पेड़ों का संरक्षण पर्यावरण और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, किसी इलाके में कौवों की संख्या कम होने के पीछे केवल पेड़ों की कमी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए स्थानीय स्तर पर प्रमाण जुटाना जरूरी है।

भोजन की उपलब्धता में बदलाव भी अहम

कौवे अलग-अलग तरह के खाद्य पदार्थ खाते हैं और प्राकृतिक वातावरण के साथ-साथ मानव बस्तियों में भी भोजन तलाशते हैं। शहरों में कचरा प्रबंधन के तरीकों में बदलाव और खुले खाद्य पदार्थों की उपलब्धता कम होने से उनके भोजन खोजने के तरीके प्रभावित हो सकते हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पक्षियों के लिए खुले में कचरा फेंकना चाहिए। प्लास्टिक और दूषित भोजन पक्षियों के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। कचरे का उचित निस्तारण और सुरक्षित प्राकृतिक वातावरण पक्षियों के लिए अधिक उपयोगी है।

ये भी पढ़ेंः  CJP के प्रदर्शन से पहले दिल्ली में सख्ती, बिना ID वालों को हिरासत में ले रही पुलिस; ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आज जंतर-मंतर पर प्रदर्शन

मोबाइल टावर और कीटनाशकों को लेकर क्या है सच्चाई?

कौवों की कमी की चर्चा में मोबाइल टावरों और कीटनाशकों का भी जिक्र किया जाता है। हालांकि, उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि मोबाइल टावर कौवों को दिशा भ्रमित कर रहे हैं या उनके श्राद्ध की थाली तक नहीं पहुंचने का कारण हैं।

इसी तरह, कीटनाशकों और अन्य रसायनों का पक्षियों पर संभावित प्रभाव वैज्ञानिक जांच का विषय है। किसी विशेष क्षेत्र में कौवों की संख्या घटने के पीछे इनकी भूमिका तय करने के लिए ठोस प्रमाणों की जरूरत होती है।

कौवों के लिए हम क्या कर सकते हैं?

पक्षियों के अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए कुछ छोटे कदम मददगार हो सकते हैं। घर की छत या बालकनी में साफ पानी रखा जा सकता है। स्थानीय प्रजातियों के अनुकूल पेड़ लगाए जा सकते हैं और पुराने पेड़ों को बचाने का प्रयास किया जा सकता है। साथ ही, प्लास्टिक और दूषित भोजन को खुले में फेंकने से बचना चाहिए।

यदि किसी इलाके में लंबे समय से कौवे कम दिखाई दे रहे हैं, तो स्थानीय पक्षी विशेषज्ञों और संरक्षण समूहों की मदद से उनकी मौजूदगी और पर्यावरण में आए बदलावों का अध्ययन किया जा सकता है।

पितरों की परंपरा के साथ प्रकृति को बचाने की जिम्मेदारी

सर्वपितृ अमावस्या पर सजी पिंडदान की थाली केवल एक धार्मिक परंपरा से जुड़ी नहीं है, बल्कि यह परिवारों की स्मृतियों और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का प्रतीक भी है। कौवे का इंतजार करते समय पुरानी पीढ़ियों की बातें और बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं।

लेकिन किसी एक दिन कौवे का न आना उनके विलुप्त होने का प्रमाण नहीं है। जरूरत इस बात की है कि हम अपने आसपास के पर्यावरण में हो रहे बदलावों को समझें और पक्षियों के लिए सुरक्षित जगह बचाने का प्रयास करें।

ये भी पढ़ेंः रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले ट्रंप अब उसी से खरीदेंगे डीजल, पुतिन को होगा फायदा; जेलेंस्की ने जताई चिंता

Spread the love

Prem Upadhyay

प्रेम उपाध्याय न्यूज प्लस लाइव में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर हैं। वे मार्च 2026 से संगठन की डिजिटल विंग के साथ जुड़े हुए हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कंटेंट रणनीति व निष्पादन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में 18 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ, प्रेम ने लाइव इंडिया, 4 रियल न्यूज और फोकस टीवी जैसे विभिन्न न्यूज चैनलों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं। अपने करियर के दौरान उन्होंने क्राइम, बिजनेस, डिफेंस, राजनीति और मनोरंजन जैसे विविध बीट्स पर गहन रिपोर्टिंग और विश्लेषण किया है। वे तथ्य-आधारित पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्ध हैं और खबरों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए स्रोतों की गहन जांच व तथ्यों के सत्यापन को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं।

Related Posts

नवरात्रि का आठवां दिन आज, मां महागौरी की पूजा करें, लगाएं नारियल का भोग; जानें मंत्र और आरती

Shardiya Navratri 2026: आज यानी 18 अक्टूबर, रविवार को शारदीय नवरात्रि का आठवां दिन है। नवरात्रि के आठवें दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन…

Spread the love

Continue reading
ग्वालियर में भीषण हादसा: शीतला माता मंदिर के पास ट्रक ने 45 श्रद्धालुओं को कुचला, 13 की मौत, 29 घायल; 7 की हालत गंभीर

Gwalior Sheetla Mata Temple Accident: मध्य प्रदेश के ग्वालियर में शनिवार-रविवार की दरमियानी रात शीतला माता मंदिर के पास भीषण हादसा हो गया। चीनौर रोड पर ढलान के पास तेज रफ्तार ट्रक अनियंत्रित…

Spread the love

Continue reading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You Missed

नवरात्रि का आठवां दिन आज, मां महागौरी की पूजा करें, लगाएं नारियल का भोग; जानें मंत्र और आरती

नवरात्रि का आठवां दिन आज, मां महागौरी की पूजा करें, लगाएं नारियल का भोग; जानें मंत्र और आरती

ग्वालियर में भीषण हादसा: शीतला माता मंदिर के पास ट्रक ने 45 श्रद्धालुओं को कुचला, 13 की मौत, 29 घायल; 7 की हालत गंभीर

ग्वालियर में भीषण हादसा: शीतला माता मंदिर के पास ट्रक ने 45 श्रद्धालुओं को कुचला, 13 की मौत, 29 घायल; 7 की हालत गंभीर

बारिश से भारत-वेस्टइंडीज पांचवां टी-20 रद्द, सीरीज 2-2 से बराबर; 4 साल बाद घर में नहीं जीती टीम इंडिया

बारिश से भारत-वेस्टइंडीज पांचवां टी-20 रद्द, सीरीज 2-2 से बराबर; 4 साल बाद घर में नहीं जीती टीम इंडिया

कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़, 18 लोगों की मौत; 45 से ज्यादा लोग घायल, अस्पताल पहुंचे CM शुभेंदु

कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़, 18 लोगों की मौत; 45 से ज्यादा लोग घायल, अस्पताल पहुंचे CM शुभेंदु

मेरठ में 3 दिन में 4 दोषियों को फांसी की सजा! सांपकांड में रविता और प्रेमी अमरदीप को मृत्युदंड, सजा सुनते ही रो पड़े दोनों

मेरठ में 3 दिन में 4 दोषियों को फांसी की सजा! सांपकांड में रविता और प्रेमी अमरदीप को मृत्युदंड, सजा सुनते ही रो पड़े दोनों

नवरात्रि का सातवां दिन आज, मां कालरात्रि की पूजा करें, गुड़ का लगाएं भोग; जानें मंत्र और आरती

नवरात्रि का सातवां दिन आज, मां कालरात्रि की पूजा करें, गुड़ का लगाएं भोग; जानें मंत्र और आरती