Modi urges less Gold buying: मध्य पूर्व संघर्ष के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से कोरोना काल जैसे कुछ एहतियाती उपाय अपनाने का आग्रह किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीयों से ईंधन बचाने के लिए सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने, घर से काम करने (Work From Home) और कारपूलिंग अपनाने की अपील की है।
इसके अलावा, उन्होंने सुझाव दिया कि भारतीय कुछ समय के लिए अपनी सबसे पसंदीदा चीजों में से एक सोने के प्रति अत्यधिक लगाव को सीमित करें। उनका मानना है कि कीमती धातु की खरीद कम करने से भारत से डॉलर का खर्च काफी हद तक घट सकता है।
सोने की खरीद पर अंकुश लगाना उन प्रमुख कदमों में से एक माना जा रहा है, जिसका 1.4 अरब आबादी वाले देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अन्य उपायों की तुलना में यह फैसला अधिक व्यावहारिक माना जा रहा है, क्योंकि सोने की खरीद को व्यक्ति सीधे नियंत्रित कर सकते हैं।
अर्थव्यवस्था पर असर
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अनुसार, 1 मई 2026 तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 690.7 अरब डॉलर रह गया, जबकि फरवरी 2026 में यह 728 अरब डॉलर के स्तर पर था। विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार गिरावट सरकार की चिंता बढ़ा रही है।
बाजार विशेषज्ञ अमित श्राफ के अनुमानों के मुताबिक, यदि भारत सोने का आयात 30% से 40% तक कम कर देता है, तो लगभग 25 अरब डॉलर की बचत हो सकती है। यदि यह कटौती 50% तक पहुंचती है, तो बचत बढ़कर 36 अरब डॉलर तक हो सकती है।
यदि चालू खाता घाटा (Current Account Deficit – CAD) 84.5 अरब डॉलर रहने का अनुमान है, तो यह बचत उस घाटे को लगभग आधा कर सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बचत का उपयोग ऊर्जा आयात के लिए किया जा सकता है, जो कृषि सहित कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए आवश्यक है।
भारत में घरेलू सोने की खपत अभी भी अधिक है, लेकिन अब यह कीमतों के प्रति तेजी से संवेदनशील होती जा रही है। World Gold Council के अनुसार, 2026 की पहली तिमाही में भारत की कुल सोने की मांग सालाना आधार पर 10% बढ़कर 151 टन हो गई। हालांकि मूल्य के हिसाब से यह वृद्धि 99% रही, क्योंकि रिकॉर्ड कीमतों ने खर्च को काफी बढ़ा दिया।
पिछले वर्ष के आंकड़े नीति निर्माताओं के लिए कुछ राहत लेकर आए हैं। वर्ष 2025 में भारत की कुल सोने की खरीद 11% घटकर 710.9 टन रह गई, जबकि आभूषणों की खपत 24% गिरकर 430.5 टन हो गई। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय परिवारों में सोने के प्रति मजबूत लगाव होने के बावजूद, ऊंची कीमतों पर खरीद में कमी आने लगती है।
युद्ध किस प्रकार असर डालता है
मध्य पूर्व में जब भी संघर्ष बढ़ता है, तो उसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है। समुद्री मार्गों में बाधा आने से तेल आपूर्ति प्रभावित होती है और कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं।
दुनिया की लगभग एक-पांचवीं ऊर्जा आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है, जिस पर ईरान का महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रभाव माना जाता है। अमेरिका और ईरान के बीच इस क्षेत्र को लेकर जारी तनाव ने वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों पर बड़ा और व्यापक असर पड़ सकता है। इसका सीधा दबाव भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों की अर्थव्यवस्था, विदेशी मुद्रा भंडार और महंगाई पर दिखाई देगा।
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