सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल- “छूने से देवता अपवित्र कैसे?” सबरीमाला केस में परंपरा बनाम अधिकार पर तीखी बहस

Sabarimala Case: सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर से जुड़े बहुचर्चित मामले की सुनवाई के दौरान अहम संवैधानिक सवाल उठे। अदालत ने पूछा कि क्या किसी मूर्ति को छूने मात्र से वह अपवित्र हो सकती है और क्या इस आधार पर किसी श्रद्धालु को पूजा से रोका जा सकता है। कोर्ट की टिप्पणियों ने धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन की बहस को और गहरा कर दिया है।

‘क्या संविधान भक्त के अधिकारों की रक्षा नहीं करेगा?’

सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि किसी व्यक्ति को केवल लिंग, जन्म या परंपरा के आधार पर पूजा से रोका जाता है, तो क्या संविधान उसकी रक्षा नहीं करेगा। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की टिप्पणी से यह संकेत मिला कि अदालत इस मुद्दे को केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रख रही, बल्कि इसे समानता और मौलिक अधिकारों के दायरे में देख रही है।

मंदिर पक्ष का तर्क: परंपरा और आस्था का सवाल

मंदिर प्रशासन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरी ने दलील दी कि पूजा-पद्धति और धार्मिक परंपराएं किसी भी मंदिर का अभिन्न हिस्सा होती हैं। उन्होंने कहा कि भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है, इसलिए मंदिर में कुछ विशेष नियम लागू हैं। उनके अनुसार, मंदिर में प्रवेश करने वाले श्रद्धालु को वहां की परंपराओं को स्वीकार करना होता है और बाहरी हस्तक्षेप उचित नहीं है।

संविधान पीठ की व्यापक सुनवाई

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ गठित की है। यह पीठ 2018 के ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिसमें सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटाया गया था।

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता

सुनवाई के दौरान अदालत भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की समीक्षा कर रही है। इसके साथ ही मस्जिदों और दरगाहों में महिलाओं के प्रवेश, पारसी समुदाय के अग्नि मंदिर, और दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े मुद्दे भी इस बहस का हिस्सा बने हुए हैं। केंद्रीय सवाल यही है। क्या धार्मिक परंपराओं के नाम पर मौलिक अधिकारों को सीमित किया जा सकता है?

सुनवाई की तय समयसीमा

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के लिए स्पष्ट समयसीमा तय की है। समर्थन में दलीलें 7–9 अप्रैल, विरोध में 14–16 अप्रैल, जबकि 21–22 अप्रैल तक जवाबी और अंतिम बहस पूरी होने की संभावना जताई गई है।

देश की नजरें फैसले पर

इस मामले का फैसला न सिर्फ सबरीमाला मंदिर, बल्कि पूरे देश में धार्मिक परंपराओं और समानता के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर एक अहम मिसाल बन सकता है। इस केस से जुड़े 60 से अधिक मुद्दे अदालत के विचाराधीन हैं, जिससे इसकी संवैधानिक अहमियत और बढ़ जाती है।

पृष्ठभूमि: 1991 से 2018 तक

सबरीमाला विवाद की शुरुआत 1991 में केरल हाई कोर्ट के फैसले से हुई, जिसमें 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई गई थी। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को असंवैधानिक करार देते हुए सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। उसी फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर अब सुनवाई जारी है।

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Varun Srivastava

वरुण श्रीवास्तव वर्तमान में न्यूज प्लस लाइव में कार्यरत हैं और दिल्ली-एनसीआर डिजिटल टीम के सक्रिय सदस्य हैं। उनके पास डिजिटल, वेब और ब्रॉडकास्ट पत्रकारिता में 13 वर्षों का अनुभव है। न्यूज प्लस लाइव से पहले, उन्होंने 4Real News, Network18, Sun Star और लोकतंत्र मीडिया जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करते हुए अपनी पत्रकारिता की पहचान बनाई।

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