मार्को रूबियो दिल्ली दोस्ती का संदेश लेकर नहीं, भारत पर दबाव की सूची लेकर आए थे!

Marco Rubio Delhi Visit: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की हालिया दिल्ली यात्रा को लेकर भारत में जो नैरेटिव बनाया गया, हकीकत उससे काफी अलग दिखाई देती है। कैमरों के सामने हाथ मिलाना, “रणनीतिक साझेदारी” और “लोकतंत्र के दो स्तंभ” जैसे बयान देना एक बात है, लेकिन बंद कमरे में हुई बातचीत का एजेंडा कहीं ज्यादा सख्त और रणनीतिक था।

1. दोस्ती की बात, लेकिन एजेंडा था अमेरिकी हितों का

रूबियो खाली हाथ नहीं आए थे। माना जा रहा है कि उनकी प्राथमिकताएं चार बड़े मुद्दों पर केंद्रित थीं:

रूस से दूरी: भारत S-400 डील और रूसी तेल खरीद कम करे, यूक्रेन मुद्दे पर अमेरिका के करीब खड़ा दिखे।

चीन पर सख्त रुख: QUAD को और मजबूत सुरक्षा ढांचे में बदला जाए, ताइवान मुद्दे पर स्पष्ट स्टैंड लिया जाए और चीनी कंपनियों पर कार्रवाई बढ़े।

भारतीय बाजार तक पहुंच: अमेरिकी एग्री, डेयरी और मेडिकल डिवाइस कंपनियों के लिए टैरिफ कम हों, GM फसलों को मंजूरी मिले।

मानवाधिकार के मुद्दे: अल्पसंख्यक, NGO और इंटरनेट शटडाउन जैसे विषयों पर अमेरिकी चिंता दोहराई गई।

2. डबल स्टैंडर्ड का आरोप

भारत में कई रणनीतिक विशेषज्ञ अमेरिका पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते रहे हैं।

जिस अमेरिका ने पाकिस्तान को अरबों डॉलर के F-16 दिए, वही भारत को रूस से दूरी बनाने की सलाह देता है।

जो खुद वैश्विक हितों के हिसाब से तेल खरीदता है, वह भारत को रूसी तेल पर लेक्चर देता है।

और जो देश अपने यहां वीजा नियम सख्त करता है, वही भारत के आंतरिक कानूनों पर सवाल उठाता है।

इसी बीच यह भी चर्चा रही कि अमेरिकी एजेंसियां भारत की कुछ कंपनियों पर प्रतिबंध संबंधी विकल्पों पर विचार कर रही थीं, जबकि सार्वजनिक मंचों पर “साझा मूल्य” की बात हो रही थी।

3. भारत का जवाब: अब 1998 वाला दौर नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने साफ संकेत दिया कि उसकी विदेश नीति किसी दबाव से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों से तय होगी।

भारत का रुख स्पष्ट रहा:

  • रूस से तेल खरीद जारी रहेगी क्योंकि देश को सस्ती ऊर्जा चाहिए।
  • QUAD में सहयोग रहेगा, लेकिन उसे NATO जैसा सैन्य गठबंधन बनाने की मंशा नहीं।
  • अमेरिका के साथ साझेदारी होगी, लेकिन बराबरी के आधार पर।

भारत अब “गुटनिरपेक्ष” की पुरानी परिभाषा से आगे बढ़कर “बहु-सहयोगी” नीति पर काम कर रहा है। जहां रिश्ते सभी से होंगे, लेकिन फैसले सिर्फ भारतीय हितों के आधार पर लिए जाएंगे।

बता दें कि मार्को रूबियो की दिल्ली यात्रा केवल दोस्ती का औपचारिक दौरा नहीं थी, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन, चीन-रूस समीकरण और इंडो-पैसिफिक रणनीति से जुड़ा बड़ा कूटनीतिक संदेश भी थी।

भारत ने यह साफ कर दिया है कि भारत अमेरिका से दोस्ती चाहता है, लेकिन दबाव में झुकने वाला देश नहीं है।

दोस्ती बराबरी से होती है, शर्तों और दबाव से नहीं और भारत अब दुनिया को यही संदेश दे रहा है।

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Varun Srivastava

वरुण श्रीवास्तव वर्तमान में न्यूज प्लस लाइव में कार्यरत हैं और दिल्ली-एनसीआर डिजिटल टीम के सक्रिय सदस्य हैं। उनके पास डिजिटल, वेब और ब्रॉडकास्ट पत्रकारिता में 13 वर्षों का अनुभव है। न्यूज प्लस लाइव से पहले, उन्होंने 4Real News, Network18, Sun Star और लोकतंत्र मीडिया जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करते हुए अपनी पत्रकारिता की पहचान बनाई।

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