Mohan Bhagwat New York: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को न्यूयॉर्क में आयोजित ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ कार्यक्रम में मानवता, धार्मिक विविधता और हिंदुत्व को लेकर बड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग धर्मों की पूजा-पद्धतियां और रास्ते भले ही अलग हों, लेकिन अंतिम सत्य और मानवता एक ही है।
भागवत ने कहा, “मैं कोई धार्मिक विद्वान नहीं हूं और न ही आपकी तरह कोई धार्मिक प्राधिकारी हूं। लेकिन मैं ऐसे समाज में काम कर रहा हूं, जो परंपरागत रूप से यह मानता है कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है। सत्य एक है और मानवता उसी सत्य की उपज है। इसलिए मानवता एक है। सत्य एक ही है, लेकिन उसे बताने वाला व्यक्ति अपनी समझ के अनुसार उसे अलग-अलग तरीकों से व्यक्त करता है। क्योंकि मनुष्य होने के नाते हम अपने दिमाग में विकसित किए गए विचारों और धारणाओं के कैदी हैं…”
#WATCH | New York, US: At the “One World One Humanity” event, RSS Chief Mohan Bhagwat says, “I am not a religious scholar, nor a religious authority like you, but I am working in a society which traditionally says that religions might be different, but humanity is one. Truth is… pic.twitter.com/ZRJOIG9FHh
— ANI (@ANI) August 29, 2026
भागवत का यह संबोधन ऐसे समय में हुआ, जब न्यूयॉर्क में उनके कार्यक्रम को लेकर समर्थन और विरोध दोनों देखने को मिले। कार्यक्रम सार्वभौमिक एकता समारोह (Universal Oneness Celebration) के नाम से आयोजित किया गया था और इसमें बड़ी संख्या में भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लोगों के शामिल होने की बात सामने आई है।
‘मुसलमानों को बाहर निकालना हिंदुत्व नहीं’
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में 2018 में दिल्ली में मुस्लिम समुदाय के साथ हुई बातचीत का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उस कार्यक्रम में उनसे सवाल पूछा गया था कि RSS हिंदू राष्ट्र की बात करता है तो मुसलमानों का क्या होगा? क्या उन्हें भारत से बाहर निकाल दिया जाएगा?
भागवत के मुताबिक, उन्होंने जवाब दिया था कि किसी मुस्लिम को भारत से बाहर निकालने की बात हिंदू विचार नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि कोई हिंदू यह मानता है कि मुस्लिम भारत में नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू विचारधारा की मूल भावना को नहीं समझता।
उन्होंने जोर देकर कहा कि हर इंसान की गरिमा है और मनुष्यों के बीच मूलभूत अंतर नहीं है।
#WATCH | New York, US: At the “One World One Humanity” event, RSS Chief Mohan Bhagwat says, “If any Hindu thinks that there should be no Muslim in Bharat, he will not remain Hindu. If you want to call yourself Hindu, you must believe that all paths are leading to the same goal… pic.twitter.com/e5UYZPppU8
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‘धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है’
भागवत ने कहा कि दुनिया में अनेक धर्म और धार्मिक परंपराएं हैं। हर धर्म के अपने रीति-रिवाज, अनुशासन और पूजा-पद्धतियां हैं। लेकिन इन अलग-अलग रास्तों का अंतिम उद्देश्य एक ही सत्य तक पहुंचना है।
उन्होंने इसे समझाने के लिए पानी का उदाहरण दिया। उनके मुताबिक, धरती पर गिरने वाला पानी अलग-अलग रास्तों से होकर अंततः समुद्र तक पहुंचता है। कुछ रास्ते सीधे होते हैं, कुछ घुमावदार, कुछ छोटे और कुछ लंबे। रास्ते अलग होना स्वाभाविक है, लेकिन मंजिल एक हो सकती है।
भागवत ने कहा, “दुनिया में बहुत सारे धर्म हैं और आज की दुनिया में धर्मों की पहचान काफी हद तक उनके रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों से होती है। किसी धार्मिक अनुशासन में शामिल होने और उस रास्ते के जरिए दिव्यता तक पहुंचने के लिए इन रीति-रिवाजों और अनुशासन का पालन करना भी जरूरी है…”
#WATCH | New York, US: At the “One World One Humanity” event, RSS Chief Mohan Bhagwat says, “There are many religions, and in today’s world, religions are largely defined by rituals. And to fit in a religious discipline, and to treat that path to divinity, this discipline of… pic.twitter.com/yod3XoR2Jg
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‘सभी रास्ते उसी सत्य की ओर जाते हैं’
भागवत ने कहा कि मनुष्य अपने अनुभवों और सीमाओं का कैदी है। उन्होंने इंसानों और कुत्तों के रंग देखने की क्षमता का उदाहरण देते हुए समझाया कि अलग-अलग जीव दुनिया को अलग तरीके से अनुभव कर सकते हैं।
उनके मुताबिक, इसका अर्थ यह नहीं कि किसी का अनुभव झूठा है। हर व्यक्ति अपनी क्षमता और अनुभव के आधार पर वास्तविकता को समझता है। इसी तरह अलग-अलग धर्म भी सत्य को अलग-अलग तरीकों से समझाते हैं।
उन्होंने कहा कि सत्य एक है, लेकिन उसे समझाने और अनुभव करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।
‘अंगुली को नहीं, रोशनी को देखना है’
RSS प्रमुख ने एक और उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी दिशा में इशारा करके कहे कि वहां रोशनी है, तो हमारा ध्यान पहले उसकी उंगली की तरफ जाता है। लेकिन अगर हम सिर्फ उंगली को देखते रह जाएं और रोशनी की ओर ध्यान ही न दें, तो असली उद्देश्य छूट जाएगा।
उन्होंने कहा कि इसी तरह धार्मिक रीति-रिवाज और परंपराएं रास्ते का हिस्सा हैं, लेकिन अंतिम सत्य की खोज ही असली उद्देश्य है।
भागवत ने कहा कि आज विज्ञान उस अंतिम अनुभव को ‘कॉन्शियसनेस’ यानी चेतना जैसे शब्दों से समझने की कोशिश कर रहा है।
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‘विविधता प्रकृति का नियम है’
भागवत ने धार्मिक और सामाजिक विविधता को लेकर कहा कि अलग-अलग पहचान और परंपराएं दुनिया की वास्तविकता हैं। उन्होंने कहा कि विविधता को खत्म करने के बजाय उसका सम्मान और संरक्षण किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विविधता प्रकृति का नियम है, जबकि एकता उसके पीछे मौजूद सत्य है।
उनका संदेश था कि जिस तरह व्यक्ति अपनी विशिष्ट पहचान और प्रकृति की रक्षा करता है, उसी तरह उसे दूसरे व्यक्ति की विशिष्टता का भी सम्मान करना चाहिए।
भारत ने हमेशा लोगों को आश्रय दिया: भागवत
अपने संबोधन में भागवत ने भारत की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में अलग-अलग संप्रदायों और समुदायों के लिए स्थान रहा है। उन्होंने कहा कि दुनिया में जिन्हें कहीं सुरक्षित स्थान नहीं मिला, उन्होंने भारत में आकर शरण ली।
उन्होंने कहा कि RSS के सामने चुनौती यह है कि मानवता की एकता के इस विचार को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाया जाए।
‘संवाद पहला कदम, सेवा दूसरा’
भागवत ने बताया कि 2018 के बाद मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। उन्होंने कहा कि समाज में विश्वास बनाने के लिए बातचीत जरूरी है।
उन्होंने इसे दो चरणों में समझाया—पहला संवाद और दूसरा सेवा।
भागवत ने RSS के सेवा कार्यों का जिक्र करते हुए दावा किया कि संगठन के करीब 1.30 लाख छोटे-बड़े सेवा प्रकल्प चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि सेवा करते समय स्वयंसेवक यह नहीं देखते कि जरूरतमंद व्यक्ति किस धर्म या समुदाय से है।
सेवा के उदाहरण का भी किया जिक्र
भागवत ने एक विमान दुर्घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि दुर्घटना के बाद RSS स्वयंसेवक राहत और बचाव के काम में पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि घायलों की मदद करने, शवों को निकालने और मृतकों की पहचान जैसी गतिविधियों में स्वयंसेवकों ने सहयोग किया।
उनके मुताबिक, उस समय स्वयंसेवकों ने यह नहीं सोचा कि पीड़ित किस धर्म से हैं। उनका कहना था कि निस्वार्थ सेवा का मतलब ही है कि बदले में किसी लाभ की अपेक्षा न की जाए।
‘राजनीति से पहले समाज को बदलना होगा’
भागवत ने कहा कि समाज में स्थायी बदलाव केवल राजनीति के जरिए नहीं लाया जा सकता। उनके मुताबिक, शुरुआत समाज से करनी होगी और जब समाज में एकता, संवाद और सेवा की मजबूत भावना पैदा होगी, तब उसका प्रभाव राजनीति और नीतियों पर भी पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दल काफी हद तक जनता की राय पर निर्भर करते हैं। इसलिए अगर समाज में किसी मुद्दे को लेकर मजबूत और सकारात्मक जनमत तैयार हो, तो राजनीति पर भी उसका प्रभाव पड़ता है।
‘ज्ञान है, लेकिन व्यवहार में उतारना मुश्किल’
भागवत ने कहा कि दुनिया के अलग-अलग समाजों में मानवता और एकता की शिक्षा पहले से मौजूद है। समस्या ज्ञान की कमी नहीं बल्कि उस ज्ञान को व्यवहार में उतारने की है।
उन्होंने अपने स्वास्थ्य का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें पता है कि चीनी उनके लिए ठीक नहीं है, लेकिन मिठाई सामने आने पर कभी-कभी वह भी खुद को समझाकर मिठाई खा लेते हैं।
इसी तरह उन्होंने कहा कि इंसान सही बात जानता है, लेकिन अपनी आदतों, इच्छाओं और पसंद-नापसंद के कारण उस पर अमल नहीं कर पाता।
‘धार्मिक अनुष्ठान व्यवहार सिखाते हैं’
भागवत ने कहा कि धार्मिक अनुष्ठानों का एक उद्देश्य यह भी है कि इंसान अपने विश्वास को व्यवहार में उतार सके।
उन्होंने रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने अलग-अलग धार्मिक परंपराओं का अभ्यास किया था और अपने अनुभव के आधार पर अलग-अलग रास्तों के एक ही लक्ष्य तक पहुंचने की बात कही थी।
‘शिक्षा की कमी से समाज में भटकाव आता है’: मोहन भागवत
भागवत ने कहा, “अगर हम समाज को लगातार शिक्षित नहीं करते हैं, तो उसमें भटकाव आने लगता है। इतिहास के दौरान किसी तरह ऐसा हुआ। इसके बाद हमारा समाज और हमारा देश विदेशी आक्रमणों का निशाना बना और बहुत-सी चीजें खो गईं…”
#WATCH | New York, US: At the “One World One Humanity” event, RSS Chief Mohan Bhagwat says, “… If we do not keep educating the society, then the deflections creep in, and somehow it happened in the course of history. I cannot point the moment. After that, our society, our… pic.twitter.com/GJeIRDbTFe
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‘लंबी लड़ाई है, निराश नहीं होना चाहिए’
भागवत ने कहा कि समाज में बदलाव रातोंरात नहीं आता। लोगों की सोच और आदत बदलने में लंबा समय लग सकता है। इसलिए किसी प्रयास के तुरंत परिणाम नहीं मिलने पर निराश नहीं होना चाहिए।
उन्होंने एक कहानी का उदाहरण दिया, जिसमें जमीन में सोना खोजने वाला व्यक्ति आखिरी कोशिश के तौर पर सिर्फ कुछ फीट और खुदाई करवाता है और वहीं उसे सोना मिल जाता है।
भागवत ने संदेश दिया कि कई बार सफलता असफलता से सिर्फ ‘तीन फीट’ दूर होती है। इसलिए सही उद्देश्य के लिए लगातार काम करते रहना चाहिए।
‘मानवता को विनाश से बचाना है’
अपने संबोधन के अंत में भागवत ने मानवता के सामने मौजूद संघर्षों और विभाजन की चुनौतियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि समाज को ऐसा रास्ता अपनाना होगा जिससे लोग आपस में लड़ते-लड़ते पूरी मानवता और धरती को नुकसान न पहुंचा दें।
उन्होंने जोर दिया कि संवाद, सेवा, एकता और मानवता के आधार पर लगातार काम करना होगा।
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