Hormuz Plan-B Goes Active! अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के सीजफायर के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री यातायात बहाल करने की कवायद तेज हो गई है। पश्चिमी देशों ने सुरक्षा जोखिम को देखते हुए अब अपना ‘Plan-B’ सक्रिय कर दिया है। फ्रांस की अगुवाई में करीब 15 देशों का एक बहुराष्ट्रीय समूह तैयार किया गया है, जिसका मकसद होर्मुज से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है।
फ्रांस की अगुवाई में बनेगा डिफेंसिव मिशन
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों (Emmanuel Macron) ने 8 अप्रैल 2026 को घोषणा करते हुए बताया कि लगभग 15 देश इस मिशन में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं। उनके मुताबिक यह पूरी तरह एक रक्षात्मक (Defensive) मिशन होगा और इसका उद्देश्य किसी सैन्य कार्रवाई के बजाय केवल समुद्री सुरक्षा बनाए रखना है। फ्रांस ने यह भी स्पष्ट किया कि मिशन को ईरान के साथ समन्वय बनाकर संचालित करने की कोशिश होगी ताकि क्षेत्रीय तनाव और न बढ़े।
क्यों पड़ी Plan-B की जरूरत?
हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर घोषित हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद होर्मुज क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। कई शिपिंग कंपनियां और जहाज मालिक अब भी वहां से गुजरने को लेकर आशंकित हैं। बीमा कंपनियों ने भी जोखिम प्रीमियम बढ़ा दिया है, जिससे समुद्री व्यापार महंगा हो गया है। ऐसे में पश्चिमी देशों ने अमेरिका की प्रत्यक्ष भूमिका के बिना वैकल्पिक सुरक्षा व्यवस्था तैयार करने का फैसला लिया।
दुनिया की तेल सप्लाई के लिए क्यों अहम है होर्मुज?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत इसी मार्ग से होकर गुजरता है। खाड़ी देशों से निकलने वाला अधिकांश कच्चा तेल और LNG इसी रास्ते के जरिए एशिया, यूरोप और अन्य बाजारों तक पहुंचता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का तनाव या व्यवधान वैश्विक तेल कीमतों को प्रभावित कर सकता है।
जहाज मालिकों को अब भी सुरक्षा का इंतजार
सीजफायर के बावजूद अभी तक होर्मुज में सामान्य समुद्री ट्रैफिक पूरी तरह बहाल नहीं हुआ है। कई जहाज मालिक सुरक्षा गारंटी और बीमा कवर मिलने का इंतजार कर रहे हैं। माना जा रहा है कि फ्रांस के नेतृत्व वाला यह नया सुरक्षा मिशन शिपिंग कंपनियों का भरोसा बहाल करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
वैश्विक बाजार की नजरें होर्मुज पर
ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय निवेशक इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। यदि सुरक्षा व्यवस्था सफल रहती है तो तेल सप्लाई सामान्य हो सकती है और कीमतों में स्थिरता लौट सकती है। लेकिन यदि क्षेत्र में फिर तनाव बढ़ता है तो इसका असर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।






