विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत–रूस रक्षा सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाता है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को और जटिल बना सकता है। वहीं, अमेरिका और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकी के बीच इसे भारत के लिए रणनीतिक बढ़त के रूप में भी देखा जा रहा है।
क्या है RELOS समझौता?
RELOS समझौते के तहत दोनों देश:
- एक-दूसरे के सैन्य बंदरगाह, एयरबेस और लॉजिस्टिक सुविधाओं का उपयोग कर सकेंगे
- शांति और युद्ध दोनों परिस्थितियों में युद्धपोतों और विमानों को ईंधन, मरम्मत और सप्लाई सुविधा मिलेगी
- आवश्यकता पड़ने पर सैनिकों, युद्धपोतों और विमानों की तैनाती संभव होगी
सूत्रों के अनुसार, इस समझौते के तहत एक समय में लगभग 3,000 सैनिक, 5 युद्धपोत और 10 विमान तक एक-दूसरे के क्षेत्र में तैनात किए जा सकते हैं।
रणनीतिक महत्व
इस समझौते से भारत को रूस के आर्कटिक क्षेत्र से लेकर व्लादिवोस्तोक और मरमांस्क जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों तक पहुंच मिलती है। इससे उत्तरी समुद्री मार्ग पर भारत की रणनीतिक मौजूदगी मजबूत होती है, जो वैश्विक व्यापार और नौसैनिक गतिविधियों के लिए बेहद अहम माना जाता है।
लंबे समय की बातचीत का नतीजा
RELOS पर चर्चा वर्ष 2018 में शुरू हुई थी और कई द्विपक्षीय शिखर बैठकों में इसे आगे बढ़ाया गया। दिसंबर 2021 तक यह समझौता अंतिम चरण में पहुंच चुका था, लेकिन तकनीकी और शब्दगत मतभेदों के कारण इसमें देरी हुई। बाद में यूक्रेन संघर्ष ने भी प्रक्रिया को प्रभावित किया।
फरवरी 2025 में मॉस्को में इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए। रूस ने दिसंबर में इसकी पुष्टि की और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मंजूरी के बाद यह कानून बन गया। यह समझौता 12 जनवरी 2026 से प्रभावी हुआ।
बदलता वैश्विक समीकरण
RELOS समझौता न केवल भारत और रूस के रक्षा संबंधों को मजबूत करता है, बल्कि वैश्विक रणनीतिक समीकरणों में भी एक नया मोड़ लाता है। इसे आर्कटिक से लेकर हिंद महासागर तक फैले एक “खामोश लेकिन प्रभावशाली गेम-चेंजर” के रूप में देखा जा रहा है।






