Donald Trump: अमेरिका और ईरान के बीच जून में बनी 60 दिन की समयसीमा अब पूरी हो चुकी है। इस दौरान दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और विवादित मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश हुई, लेकिन कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका। इसके बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समयसीमा खत्म होते ही ईरान के खिलाफ नया बड़ा सैन्य अभियान शुरू नहीं किया।
शुरुआत में ट्रंप कई बार चेतावनी दे चुके थे कि बातचीत विफल होने की स्थिति में सैन्य विकल्प खुला है। इसलिए माना जा रहा था कि डेडलाइन खत्म होते ही अमेरिका फिर से ईरान पर बड़ा हमला कर सकता है। हालांकि, आखिरी समय में अमेरिकी रुख कुछ नरम नजर आया। अब संकेत हैं कि वॉशिंगटन तत्काल हमले के बजाय आर्थिक दबाव, समुद्री शक्ति और कूटनीति को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहता है।
हमले की जगह दबाव बढ़ाने का फैसला
ट्रंप प्रशासन की मौजूदा रणनीति को ईरान से पीछे हटने के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। बल्कि अमेरिका सीधे युद्ध में जाने के बजाय ईरान को दूसरे मोर्चों पर कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।
अमेरिका की रणनीति में सबसे पहले ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाना शामिल है। तेल से होने वाली कमाई को प्रभावित करने के लिए प्रतिबंधों को और सख्त किया जा सकता है। इसके अलावा ईरान के साथ कारोबार करने वाली विदेशी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर भी कार्रवाई का दबाव बढ़ाया जा रहा है।
अमेरिका का आकलन है कि अगर ईरान की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती रही तो तेहरान को बातचीत की मेज पर लौटना पड़ सकता है।
तीन मोर्चों पर ईरान को घेरने की रणनीति
मौजूदा अमेरिकी रणनीति को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है।
पहला मोर्चा- अर्थव्यवस्था।
ईरान की तेल आय और अंतरराष्ट्रीय कारोबार को प्रभावित करना। इसका उद्देश्य तेहरान की आर्थिक क्षमता को कमजोर करना है।
दूसरा मोर्चा- समुद्र।
ईरान के समुद्री व्यापार और होर्मुज स्ट्रेट में उसकी गतिविधियों पर दबाव बनाए रखना। इस क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक मौजूदगी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
तीसरा मोर्चा- बातचीत।
अमेरिका सैन्य दबाव के साथ कूटनीतिक रास्ता भी खुला रखना चाहता है। सीधे संवाद के अलावा दूसरे देशों के माध्यम से भी बातचीत की संभावना तलाशने की कोशिश की जा रही है।
यानी ट्रंप फिलहाल ईरान के खिलाफ ‘हमला करो और आगे बढ़ो’ वाली रणनीति के बजाय उसे लगातार दबाव में रखकर अपनी शर्तों पर बातचीत के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।
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ट्रंप ने सीधा हमला क्यों टाला?
ईरान पर दोबारा बड़े पैमाने पर हमला करना अमेरिका के लिए भी जोखिम से खाली नहीं है। सैन्य कार्रवाई शुरू होने के बाद संघर्ष सिर्फ ईरान तक सीमित रहने की गारंटी नहीं है। इसका असर खाड़ी के दूसरे देशों, अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है।
सबसे बड़ी चिंता होर्मुज स्ट्रेट को लेकर है। अगर इस रास्ते पर तनाव बढ़ता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच सकती है।
इसके अलावा लंबे सैन्य अभियान में अमेरिका के हथियारों, मिसाइलों और ड्रोन के भंडार पर भी दबाव बढ़ता है। ऐसे में ट्रंप के लिए आर्थिक और कूटनीतिक दबाव का विकल्प फिलहाल कम जोखिम वाला दिखाई देता है।
होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा सौदेबाजी का मुद्दा
अमेरिका-ईरान विवाद में अब होर्मुज स्ट्रेट सबसे अहम मुद्दों में शामिल हो गया है। फारस की खाड़ी और अरब सागर के बीच स्थित यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
ईरान चाहता है कि अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकाबंदी खत्म करे और उस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दे। इसके बाद ही वह होर्मुज में जहाजों की आवाजाही को पूरी तरह सामान्य करने पर विचार करने के संकेत दे रहा है।
दूसरी ओर अमेरिका चाहता है कि इस अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग से जहाजों की आवाजाही बिना किसी रुकावट के जारी रहे।
इस तरह होर्मुज दोनों देशों के लिए दबाव बनाने का सबसे बड़ा साधन बन चुका है।
ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था पर अमेरिका की नजर
अमेरिकी रणनीति का एक बड़ा हिस्सा ईरान की आंतरिक आर्थिक स्थिति पर टिका है। लंबे संघर्ष और प्रतिबंधों के कारण ईरान पहले से ही महंगाई, कमजोर मुद्रा और आर्थिक संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि युद्ध को लगातार जारी रखने के बजाय ईरान को आर्थिक मुश्किलों के बीच छोड़ना ज्यादा प्रभावी हो सकता है। इससे ईरानी सरकार पर घरेलू दबाव बढ़ सकता है और वह बातचीत में अधिक लचीला रुख अपना सकती है।
हालांकि ईरान का अनुभव बताता है कि वह लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच अपनी अर्थव्यवस्था चलाता रहा है। इसलिए यह कहना अभी मुश्किल है कि अमेरिकी दबाव से तेहरान कितनी जल्दी झुकेगा।
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चीन पर भी बढ़ सकता है दबाव
अमेरिका की रणनीति का असर ईरान के अलावा उसके कारोबारी साझेदारों पर भी पड़ सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक ट्रंप प्रशासन उन चीनी रिफाइनरियों और वित्तीय संस्थानों पर कार्रवाई बढ़ाने पर विचार कर रहा है, जो ईरानी तेल कारोबार से जुड़े हैं।
अगर ऐसा होता है तो ईरान की तेल बिक्री पर असर पड़ सकता है और उसकी विदेशी मुद्रा आय और कम हो सकती है।
इसका मकसद साफ है—ईरान की कमाई के प्रमुख स्रोत को निशाना बनाकर उसकी सौदेबाजी की ताकत कम करना।
ईरान भी जवाब देने की स्थिति में
ईरान के पास भी अमेरिका पर दबाव बनाने के कई विकल्प हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट है। अगर यहां तनाव बढ़ता है तो इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर पड़ेगा।
यही वजह है कि अमेरिका भी इस मुद्दे पर बहुत सावधानी से कदम बढ़ा रहा है। एक गलत फैसला पूरे क्षेत्र में संघर्ष को फिर से भड़का सकता है।
ईरान की ओर से भी साफ संकेत हैं कि वह अमेरिकी दबाव के सामने बिना शर्त समझौते के लिए तैयार नहीं है।
अब ट्रंप के सामने क्या विकल्प?
60 दिन की समयसीमा खत्म होने के बाद भी ट्रंप के पास कई विकल्प खुले हैं। वह आर्थिक प्रतिबंधों को और कड़ा कर सकते हैं, समुद्री दबाव बढ़ा सकते हैं और साथ ही बातचीत का रास्ता खुला रख सकते हैं।
अगर यह रणनीति काम नहीं करती तो सैन्य विकल्प दोबारा सामने आ सकता है।
फिलहाल तस्वीर यही है कि ट्रंप ने ईरान पर हमला करने का फैसला रद्द नहीं किया है, बल्कि उसे टालकर दबाव की रणनीति को आगे बढ़ाया है।
अमेरिका ईरान की अर्थव्यवस्था और समुद्री व्यापार पर दबाव बना रहा है, जबकि ईरान होर्मुज स्ट्रेट को अपनी ताकत के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।
इसलिए 60 दिन की डेडलाइन भले ही खत्म हो गई हो, लेकिन अमेरिका-ईरान टकराव अभी खत्म नहीं हुआ है। असली परीक्षा अब यह होगी कि आर्थिक दबाव और कूटनीति से समझौता होता है या दोनों देश फिर सैन्य टकराव की ओर लौटते हैं।
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