BRICS Summit 2026: चार देशों के आर्थिक समूह के रूप में शुरू हुआ BRICS आज एक बड़े वैश्विक आर्थिक और कूटनीतिक मंच के रूप में उभर चुका है। समूह अब ऐसी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत कर रहा है, जो मौजूदा पश्चिम-केंद्रित वैश्विक ढांचे को चुनौती देती है। नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान समूह के भविष्य, आर्थिक सहयोग और वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था को लेकर चर्चा जारी है।
वॉल स्ट्रीट से शुरू हुआ BRIC का सफर
BRICS की कहानी करीब दो दशक पुरानी है। सितंबर 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के विदेश मंत्रियों की न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान पहली महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। उस समय इसे BRIC कहा जाता था। चार बड़ी गैर-पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर लाने का विचार उस दौर में कई लोगों को एक राजनीतिक प्रयोग जैसा लगा था।
हालांकि, BRIC नाम इससे पहले ही चर्चा में आ चुका था। वर्ष 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने BRIC शब्द का इस्तेमाल ब्राजील, रूस, भारत और चीन की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के संदर्भ में किया था।
नाम से आगे बढ़कर शक्ति का नया केंद्र
समय के साथ BRIC केवल एक आर्थिक अवधारणा नहीं रहा। यह धीरे-धीरे संस्थागत सहयोग के मंच में बदल गया और बाद में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के साथ इसका नाम BRICS हो गया।
आज समूह का प्रभाव केवल व्यापार और आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है। BRICS वैश्विक वित्तीय व्यवस्था, विकास वित्त, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों की बड़ी भूमिका की मांग को भी आगे बढ़ा रहा है।
क्या डॉलर के विकल्प की तैयारी है?
BRICS की रणनीति को केवल एक करेंसी की जगह दूसरी करेंसी लाने के प्रयास के तौर पर देखना सही नहीं होगा। समूह का जोर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान के वैकल्पिक माध्यमों और वित्तीय निर्भरता को कम करने पर है।
इसका उद्देश्य यह है कि सदस्य देश किसी एक वित्तीय या भुगतान व्यवस्था पर अत्यधिक निर्भर न रहें। इससे प्रतिबंधों, टैरिफ या एकतरफा वित्तीय फैसलों का उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने वाला असर कम किया जा सकता है।
प्रतिबंध और टैरिफ वॉर के दौर में BRICS की चुनौती
नई दिल्ली में हो रहा BRICS सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हो रहा है, जब वैश्विक व्यवस्था कई मोर्चों पर दबाव में है। प्रतिबंध, व्यापार युद्ध, सशस्त्र संघर्ष और वित्तीय ढांचे के रणनीतिक इस्तेमाल ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को लेकर कई देशों की चिंताएं बढ़ाई हैं।
ऐसे में BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल बहुध्रुवीय दुनिया की बात करना नहीं, बल्कि उसके लिए व्यावहारिक विकल्प तैयार करना है।
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अमेरिका को यूरोप से अलग-थलग करने की रणनीति?
BRICS के बढ़ते प्रभाव को लेकर यह सवाल भी उठता है कि क्या समूह की बढ़ती आर्थिक और कूटनीतिक सक्रियता अमेरिका को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिश है। हालांकि, BRICS की आधिकारिक दिशा को केवल अमेरिका-विरोधी गठबंधन के रूप में देखना इसके पूरे उद्देश्य को सीमित कर देगा।
समूह का मुख्य जोर वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने, आर्थिक निर्भरता कम करने और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार पर है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।
रूस की शुरुआती सोच से आज की हकीकत तक
करीब दो दशक पहले रूस उन देशों में शामिल था, जिन्होंने ब्राजील, भारत और चीन के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय विचार यह था कि दुनिया की बड़ी आबादी वाले देशों को वैश्विक फैसलों में अधिक प्रभाव मिलना चाहिए।
आज BRICS उसी विचार का कहीं अधिक बड़ा और संस्थागत रूप है। समूह अब केवल नई विश्व व्यवस्था की संभावना पर चर्चा नहीं कर रहा, बल्कि उसे आकार देने की कोशिश कर रहा है।
अब असली परीक्षा परिणामों की
हालांकि BRICS के सामने अभी कई चुनौतियां हैं। आर्थिक ताकत को वास्तविक सामूहिक प्रभाव में बदलने के लिए सदस्य देशों को आपसी व्यापार बढ़ाना होगा, New Development Bank के जरिए वित्तीय सहयोग मजबूत करना होगा और आसान एवं भरोसेमंद सीमा-पार भुगतान प्रणालियां विकसित करनी होंगी।
BRICS की सफलता का पैमाना केवल सदस्य देशों की संख्या या आर्थिक आकार नहीं होगा। असली सवाल यह होगा कि क्या समूह अपने सदस्यों के लिए ठोस आर्थिक और वित्तीय विकल्प तैयार कर पाता है।
नई दिल्ली से अगले अध्याय की शुरुआत
इस लिहाज से नई दिल्ली में हो रहा BRICS सम्मेलन केवल एक और शिखर बैठक नहीं है। यह समूह के अब तक के सफर की समीक्षा और अगले चरण की दिशा तय करने का अवसर है।
बीस साल पहले जिस विचार को महज एक प्रयोग माना जा रहा था, वह आज वैश्विक शक्ति संतुलन की बहस का अहम हिस्सा बन चुका है। अब चुनौती यह है कि BRICS अपनी आर्थिक ताकत को ऐसी व्यवस्था में बदल पाए, जो अधिक निष्पक्ष, स्थिर और वास्तव में बहुध्रुवीय हो।
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