नई दिल्ली: राज्यसभा चुनाव 2026 में एक बार फिर क्रॉस वोटिंग ने राजनीतिक दलों, खासकर विपक्ष, की एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 37 सीटों में से 26 पर उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए गए, जबकि बिहार, हरियाणा और ओडिशा की 11 सीटों पर मुकाबला हुआ। इन चुनावों में कई जगह विधायकों के पार्टी लाइन से हटकर वोट करने, अनुपस्थित रहने या मतदान से दूरी बनाने के कारण नतीजे पूरी तरह बदल गए।
इन 11 सीटों में से 9 पर एनडीए या उसके समर्थित उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की, जबकि विपक्ष के खाते में केवल 2 सीटें ही आईं। नतीजों ने साफ कर दिया कि संख्या बल होने के बावजूद विपक्ष अपने विधायकों को एकजुट रखने में नाकाम रहा।
बिहार: मजबूत गणित भी नहीं बचा पाया हार से
बिहार में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया। महागठबंधन के नेता Tejashwi Yadav ने अपनी रणनीति के तहत Asaduddin Owaisi और Mayawati का समर्थन हासिल कर लिया था। इसके बाद महागठबंधन उम्मीदवार की जीत लगभग तय मानी जा रही थी।
लेकिन मतदान के दिन समीकरण बदल गया। आरजेडी के एक विधायक और कांग्रेस के तीन विधायक वोटिंग के दौरान अनुपस्थित रहे। चार वोट कम पड़ने से महागठबंधन पिछड़ गया और इसका फायदा एनडीए को मिला।
एनडीए ने न सिर्फ अपनी तय चार सीटें जीतीं, बल्कि पांचवीं सीट भी अपने नाम कर ली। इस तरह बिहार में उसने क्लीन स्वीप कर दिया।
चुनाव के बाद Tejashwi Yadav ने कहा कि अगर विधायक साथ देते तो परिणाम अलग हो सकता था।
हरियाणा: लंबी काउंटिंग में खुली अंदरूनी कलह
हरियाणा में चुनाव प्रक्रिया असामान्य रूप से लंबी चली। कांग्रेस के दो विधायकों के वोट पर आपत्ति के कारण काउंटिंग देर रात शुरू हुई और करीब 16 घंटे बाद नतीजे सामने आए।
कांग्रेस ने विधायकों को टूट से बचाने के लिए उन्हें राज्य से बाहर रखा था, लेकिन इसके बावजूद करीब 5 विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग की खबर सामने आई।
Bhupinder Singh Hooda ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया, जबकि मुख्यमंत्री Nayab Singh Saini ने विपक्ष पर अपने ही विधायकों पर भरोसा न होने का आरोप लगाया।
अंततः दोनों दलों को एक-एक सीट मिली, लेकिन क्रॉस वोटिंग ने विपक्ष की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए।
ओडिशा: गठबंधन के बावजूद बिखराव
ओडिशा में कांग्रेस और बीजेडी के बीच तालमेल भी नतीजों को नहीं बचा सका। Naveen Patnaik की पार्टी के 8 और कांग्रेस के 3 विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर वोट किया।
कुल 11 विधायकों की क्रॉस वोटिंग से पूरा समीकरण बदल गया और बीजेपी उम्मीदवार को जीत मिल गई, जबकि विपक्षी उम्मीदवार हार गया।
कांग्रेस विधायक सोफिया फिरदौस ने कहा कि बीजेडी को समर्थन देने का फैसला विधायकों से बिना चर्चा के लिया गया था, इसलिए उन्होंने अपने विवेक से वोट किया।
पहले भी दिख चुका है ऐसा ट्रेंड
राज्यसभा चुनावों में क्रॉस वोटिंग पहले भी कई बार परिणाम बदल चुकी है।
- 2022 में हरियाणा में Ajay Maken को हार का सामना करना पड़ा।
- 2024 में हिमाचल प्रदेश में Abhishek Manu Singhvi भी क्रॉस वोटिंग के कारण चुनाव हार गए।
- उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में भी कई बार विधायक पार्टी लाइन से हटकर वोट कर चुके हैं।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि राज्यसभा चुनाव अब केवल संख्या का खेल नहीं रह गया है।
क्रॉस वोटिंग के पीछे क्या कारण?
आंतरिक असंतोष: टिकट वितरण और नेतृत्व को लेकर नाराजगी विधायकों को पार्टी लाइन से हटने पर मजबूर करती है।
गठबंधन की जटिलता: जब कई दल मिलकर उम्मीदवार खड़ा करते हैं, तो सभी विधायकों की सहमति नहीं बन पाती।
राजनीतिक दबाव: विपक्ष अक्सर आरोप लगाता है कि सत्ता पक्ष दबाव या प्रबंधन के जरिए वोट प्रभावित करता है।
संगठनात्मक कमजोरी: विपक्षी दलों में विधायकों पर नियंत्रण अपेक्षाकृत कमजोर माना जाता है।
व्यक्तिगत और राजनीतिक हित: कई विधायक अपने भविष्य को ध्यान में रखते हुए अलग रुख अपनाते हैं।
निष्कर्ष
राज्यसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल सत्ताधारी दल से मुकाबला नहीं, बल्कि अपने विधायकों को एकजुट रखना भी है।
क्रॉस वोटिंग अब एक अपवाद नहीं, बल्कि लगातार उभरता हुआ ट्रेंड बन चुकी है, जो आने वाले समय में देश की राजनीति पर गहरा असर डाल सकती है।








