Houthi Rebels Seize Perim Island: होर्मुज स्ट्रेट के बाद अब एक और अहम समुद्री तेल मार्ग बाब अल-मंदेब स्ट्रेट पर संकट गहराने लगा है। यमन के हूती विद्रोहियों ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पेरिम (मयून) द्वीप पर कब्जा करने का दावा किया है। यह समुद्री मार्ग एशिया और यूरोप के बीच जहाजों की आवाजाही के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
बाब अल-मंदेब पर हूतियों का कब्जे का दावा
हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने दावा किया कि सऊदी समर्थित सेनाओं ने बाब अल-मंदेब के बीच स्थित पेरिम द्वीप पर अपना नियंत्रण खो दिया है। हूतियों के मुताबिक, अब उनके नियंत्रण में करीब 5,400 वर्ग किलोमीटर का इलाका आ गया है।
हूती प्रवक्ता ने कहा कि बाब अल-मंदेब से सऊदी अरब को छोड़कर बाकी सभी देशों के जहाजों को गुजरने की इजाजत होगी। हूतियों का आरोप है कि सऊदी अरब ने उनके खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी कर रखी है।
हूती प्रवक्ता याह्या सरी ने कहा कि लाल सागर में समुद्री जहाजों की आवाजाही सुरक्षित है, लेकिन सऊदी जहाजों को इससे बाहर रखा गया है। उन्होंने कहा कि जब तक यमन पर लगी नाकेबंदी खत्म नहीं होती, तब तक सऊदी बलों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को और तेज किया जाएगा। यह बयान बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के आसपास हूतियों की बढ़त की खबरों के बीच आया है।
Houthi spokesman Yahya Saree said maritime navigation in the Red Sea is safe, except for Saudi ships. He vowed to escalate military action against Saudi forces until the blockade on Yemen ends.
The statement came amid reports of Houthi advances around the Bab el-Mandeb Strait. pic.twitter.com/glKDPp5vPN
— Al Jazeera Breaking News (@AJENews) September 11, 2026
बाब अल-मंदेब पर कब्जे में 9 दिन लगे
3 सितंबर: हूतियों ने यमन के लाल सागर तट पर तीन तरफ से हमला शुरू किया। इसके बाद मोखा शहर की घेराबंदी कर दी गई।
8 सितंबर: हूतियों की बढ़त को देखते हुए सऊदी अरब ने जवाबी हमला शुरू किया। मिसाइल और ड्रोन हमलों में 73 लोग घायल हुए।
10 सितंबर: हूतियों ने मोखा शहर और उसके बंदरगाह पर कब्जा कर लिया। इसके बाद हूती लड़ाके बाब अल-मंदेब की ओर बढ़े और धुबाब के साथ लाल सागर के आसपास के द्वीपों पर भी दबाव बनाया।
11 सितंबर: हूतियों ने पेरिम यानी मयून द्वीप पर कब्जे का दावा किया। इस द्वीप पर नियंत्रण मिलने से उन्हें बाब अल-मंदेब समुद्री मार्ग के बेहद करीब एक रणनीतिक ठिकाना मिल गया है।
ईरान ने हूतियों की मदद की
रॉयटर्स के मुताबिक, ईरान ने हूतियों को सैन्य सलाह और मदद दी थी। एक राजनयिक के मुताबिक, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कई वरिष्ठ कमांडर यमन में मौजूद हैं। अभियान शुरू होने से पहले ईरान और हूतियों के बीच कई बैठकें भी हुई थीं।
हालांकि, मोखा पर हमला करने का फैसला हूतियों ने खुद लिया था। यमन के पांच सैन्य अधिकारियों ने भी कहा कि लाल सागर में हूतियों के नए अभियान में ईरान ने मदद की थी।
यमनी सूत्रों का दावा है कि कुद्स फोर्स के कमांडर अब्दोलरेजा शहलाई हूतियों के अभियान को दिशा दे रहे थे। हालांकि, ईरान ने इस दावे की पुष्टि नहीं की है।
ये भी पढ़ेंः G7 पर पुतिन का सीधा हमला: ‘पश्चिम अब पहले जैसा मजबूत नहीं’, मोदी ने व्यापार और सुरक्षित समुद्री रास्तों पर दिया जोर
ट्रंप ने सऊदी की एयरस्ट्राइक की मांग ठुकराई
एक्सिऑन की रिपोर्ट के मुताबिक, हूतियों के खिलाफ कार्रवाई में सऊदी अरब को अमेरिकी मदद की उम्मीद थी। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सीधे अमेरिकी हवाई हमले करने की अपील की थी, लेकिन ट्रंप ने इसे ठुकरा दिया।
हालांकि, अमेरिका क्षेत्र की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है। CNN के मुताबिक, 100 से ज्यादा अमेरिकी सैन्य सलाहकार सऊदी अरब में मौजूद हैं। एक अमेरिकी अधिकारी ने इनकी संख्या करीब 200 बताई है।
अमेरिकी सैन्यकर्मी सऊदी सेना को हूतियों से जुड़ी खुफिया जानकारी जुटाने में मदद कर रहे हैं। इस तरह अमेरिका फिलहाल सीधे सैन्य कार्रवाई से बचते हुए सऊदी को खुफिया और रणनीतिक सहयोग दे रहा है।
हूती और सऊदी के बीच दुश्मनी की वजह
धार्मिक फर्क ने बढ़ाया तनाव: हूती यमन के जायदी शिया समुदाय से आते हैं, जबकि सऊदी अरब सुन्नी बहुल देश है। दोनों की धार्मिक मान्यताओं में अंतर है। हालांकि, हूती-सऊदी संघर्ष को केवल शिया बनाम सुन्नी की लड़ाई मानना सही नहीं होगा।
विवाद की जड़ 1990 के दशक में पड़ी: यमन के उत्तरी हिस्से में जायदी समुदाय को लगने लगा था कि सरकार उनके राजनीतिक और धार्मिक हितों की अनदेखी कर रही है। इसी असंतोष से हूती आंदोलन मजबूत हुआ। 2004 में यमनी सरकार और हूतियों के बीच पहली बड़ी सशस्त्र लड़ाई हुई।
2014 में सत्ता की लड़ाई तेज हुई: 2014 में हूतियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया और राष्ट्रपति अब्द-रब्बू मंसूर हादी की सरकार को चुनौती दी। सऊदी अरब को डर था कि हूतियों के मजबूत होने से ईरान का प्रभाव उसकी दक्षिणी सीमा तक पहुंच जाएगा।
2015 में सऊदी युद्ध में उतरा: 2015 में सऊदी अरब ने हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने हूती ठिकानों पर हवाई हमले किए और उनके कब्जे वाले इलाकों की नाकेबंदी की, ताकि हथियार और दूसरे सामान वहां तक न पहुंच सकें।
इसके जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू किए।
संघर्ष में ईरान-सऊदी प्रतिद्वंद्विता भी जुड़ी
धीरे-धीरे यह लड़ाई सिर्फ यमन की सत्ता का संघर्ष नहीं रही। यह ईरान और सऊदी अरब के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई का भी हिस्सा बन गई।
सऊदी अरब हूतियों को ईरान के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव से जोड़कर देखता है, जबकि ईरान हूतियों को सैन्य निर्देश देने से इनकार करता है।
ये भी पढ़ेंः नेपाल में पुनर्निर्माण के लिए ₹4.52 लाख करोड़ की जरूरत, GDP से भी ज्यादा; बाढ़ में 16 लाख प्रभावित, 1,377 मौत






