Islamic NATO Alliance: आर्थिक तंगी से जूझ रहा पाकिस्तान भारत के खिलाफ रणनीति बनाने से बाज नहीं आ रहा है। संघर्ष से जूझ रहे तीन सुन्नी मुस्लिम देशों के बीच हुआ सैन्य गठबंधन इसका संकेत माना जा रहा है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए ने शुक्रवार को एक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस नई आपसी सहमति के बाद ‘Islamic NATO’ जैसे किसी गुट के गठन की चर्चा शुरू हो गई है, जो क्षेत्र के शक्ति संतुलन को बदल सकता है।
इस समूह में शामिल तीनों देशों के पास मजबूत सैन्य क्षमताएं हैं। पाकिस्तान एकमात्र मुस्लिम देश है जिसके पास परमाणु हथियार हैं। तुर्किए के पास मजबूत रक्षा उद्योग है और NATO में उसकी सेना दूसरी सबसे बड़ी है। वहीं, सऊदी अरब दुनिया के प्रमुख कच्चे तेल निर्यातक देशों में शामिल है। उसके पास आर्थिक ताकत के साथ-साथ अमेरिकी हथियारों से लैस एक मजबूत सेना भी है।
इन तीनों देशों का यह गठबंधन ऐसे समय में बन रहा है, जब मध्य पूर्व में सुरक्षा हालात बेहद अस्थिर हैं। इस समझौते पर मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए।
इस गठबंधन के बनने की एक प्रमुख वजह ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले भी मानी जा रही है। ईरान ने खाड़ी देशों के उन राजशाही शासनों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की है, जो पारंपरिक रूप से अमेरिका के सहयोगी रहे हैं। इससे अमेरिकी सुरक्षा कवच की सीमाएं उजागर हुई हैं और खाड़ी देशों को सुरक्षा के वैकल्पिक तरीकों पर विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि तीनों देशों में से किसी एक पर भी सशस्त्र हमला सभी देशों पर हमला माना जाएगा। हालांकि, ऐसे हमले की स्थिति में क्या तीनों देश संयुक्त सैन्य कार्रवाई करेंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
पाकिस्तान के साथ भारत के तनावपूर्ण रिश्तों और इस्लामाबाद को अंकारा के समर्थन को देखते हुए भारत भी इस घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रख रहा है।
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