Panipat textile industry pollution: यमुना को साफ करने का दावा करने वाली सरकारों ने पानीपत के कपड़ा उद्योग से जुड़े गंभीर प्रदूषण मुद्दे को लंबे समय से नजरअंदाज किया है। पानीपत में रोजाना लाखों टन पुराना और इस्तेमाल के बाद फेंका गया कपड़ा वैश्विक बाजारों से आता है, जिसका या तो उपयोग नहीं किया गया होता है या इस्तेमाल के बाद कचरे में फेंक दिया जाता है।
पानीपत की रीसाइक्लिंग यूनिटों में इन कपड़ों को छांटा जाता है। इनमें से चेन, बटन और अन्य हिस्से अलग किए जाते हैं, फिर इन्हें धोकर केमिकल प्रोसेस से साफ किया जाता है। इसके बाद इन्हें दोबारा धागे में बदलकर चादर, कालीन और अन्य उत्पाद बनाए जाते हैं, जिन्हें फिर से वैश्विक बाजारों में बेचा जाता है। यह उद्योग भारी मुनाफा कमाता है और इसे “कचरे से सोना” बनाने का मॉडल भी कहा जाता है।

हालांकि, इस उद्योग का एक गंभीर पहलू भी है। पानीपत की कपड़ा औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला जहरीला और अम्लीय अपशिष्ट जल अक्सर बिना शोधन के बाहर निकलता है। रंगाई और प्रोसेसिंग इकाइयों का गंदा पानी खुले नालों के जरिए खेतों और आवासीय क्षेत्रों से होकर गुजरता है, जिससे कई जगहों पर मिट्टी और जल स्रोत रासायनिक अवशेषों से दूषित हो जाते हैं। अंततः यह प्रदूषित पानी यमुना नदी में मिल जाता है, जो दिल्ली सहित उत्तरी भारत के लाखों लोगों के लिए पेयजल का प्रमुख स्रोत है।
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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) पहले भी कपड़ा क्षेत्र में पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन और नियामक खामियों को उजागर कर चुका है। वर्तमान में भी एक याचिका पर सुनवाई चल रही है, जिसमें दावा किया गया है कि पानीपत का कपड़ा उद्योग अवैध रूप से औद्योगिक अपशिष्ट और उत्सर्जन का बड़ा स्रोत बन चुका है, जो यमुना को लगातार प्रदूषित कर रहा है।

फास्ट फैशन और वैश्विक टेक्सटाइल वेस्ट का यह पूरा चक्र अब एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है। यह प्रदूषण हवा में, खुले नालों में और आसपास के समुदायों के जीवन में सीधे असर डाल रहा है, जिससे श्रमिक और स्थानीय लोग लगातार जोखिम में हैं।
जापान, अमेरिका और यूरोप सहित कई देशों से आने वाले पुराने कपड़े यहां छांटे जाते हैं, काटे जाते हैं और दोबारा उपयोग योग्य बनाकर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में वापस भेज दिए जाते हैं। लेकिन इस “रीसाइक्लिंग मॉडल” की असली कीमत उत्तर भारत के बड़े हिस्से को पर्यावरणीय नुकसान के रूप में चुकानी पड़ रही है।
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