India-US Tariff: अमेरिकी सीनेट ने रूस से तेल खरीदने वाले भारत समेत अन्य देशों पर 100% टैरिफ लगाने वाले कानून के पक्ष में 86 के मुकाबले 12 वोटों से मंजूरी दे दी है। सितंबर में सीनेट की बैठक दोबारा शुरू होने के बाद इस बिल के पारित होने की उम्मीद है। इसके बाद इसे वोटिंग के लिए अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भेजा जाएगा। हाउस से भी बिल को मंजूरी मिलने की संभावना जताई जा रही है।
भारत-अमेरिका संबंधों के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। टिप्पणी में कहा गया है कि जब भारत और अमेरिका के रिश्ते बेहतर हो रहे थे, तब अमेरिकी कांग्रेस ने उनका समर्थन किया था, लेकिन अब जब दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ रहा है, तो कांग्रेस की ओर से कोई खास विरोध नहीं हो रहा है। ऐसे में नई दिल्ली को इससे एक राजनीतिक सबक लेना चाहिए।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही भारत को रूसी सस्ते तेल की खरीद से दूर करने की कोशिश कर चुके हैं। इसके तहत भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए 25% अतिरिक्त पेनल्टी टैरिफ लगाया गया था। हालांकि, भारत ने इसके बावजूद बड़ी मात्रा में रूसी कच्चे तेल की खरीद जारी रखी। इसके अलावा रूसी कच्चे तेल से भारतीय रिफाइनरियों में तैयार किए गए रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का यूरोप को भी निर्यात किया गया।
अमेरिका अब अपनी वैश्विक बढ़त और खासकर टेक्नोलॉजी की दौड़ में भारत के बजाय चीन को मुख्य चुनौती मानता है। इसके बावजूद रूस के खिलाफ अमेरिकी नीति, यूक्रेन में जारी संघर्ष और प्रतिबंधों के जरिए रूस पर दबाव बनाने की कोशिशों के बीच भारत को निशाना बनाए जाने पर सवाल उठ रहे हैं। सीनेटर रिचर्ड ब्लुमेंथल द्वारा आगे बढ़ाए गए इस कानून को भारत के लिए दबाव बनाने वाले कदम के तौर पर देखा जा रहा है।
भारत और रूस के बीच लंबे समय से मजबूत रणनीतिक और ऊर्जा संबंध रहे हैं। अमेरिका की ओर से रूसी तेल खरीद को लेकर भारत पर लगातार दबाव बनाए जाने से दोनों देशों के बीच मतभेद बढ़ने की संभावना है।
भारत दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातक देशों में शामिल है। ऐसे में भारत का रुख रहा है कि उसे अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर तेल खरीदने का फैसला करने का अधिकार होना चाहिए। SCO समिट में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी स्पष्ट किया कि भारत अपने देश की जनता के हितों को सर्वोपरि रखते हुए जहां से भी सस्ता तेल मिलेगा, वहां से तेल खरीदना जारी रखेगा।
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