Putin Master Plan: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की यह गहरी चाल मानी जा रही है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही हथियार देने से मना कर चुके हैं। अब यूक्रेन की जमीन रूस को देकर ट्रंप युद्ध रोकना चाहते हैं। जेलेंस्की पुतिन के फैलाए “माया जाल” में बुरी तरह फंसे हैं, जबकि यूरोप 2029 के डर से बंकर बना रहा है।
पुतिन खुद कह चुके हैं कि वे सोवियत संघ वापस नहीं बनाना चाहते, लेकिन “यूरेशियन यूनियन” बनाकर 7 देशों पर कंट्रोल चाहते हैं।
यूक्रेन को दो टुकड़ों में बांटने का ‘नोवोरसिया’ प्लान
पुतिन का असली टारगेट 2026 तक नीपर नदी के पूर्व का पूरा यूक्रेन हड़पना माना जा रहा है।
पुतिन के मास्टर प्लान 2025 के लक्ष्य:
1 सितंबर तक डोनेट्स्क के साथ लुहान्स्क पर पूरा कब्जा
उत्तरी सीमा पर बफर जोन तैयार करना
2026 का लक्ष्य:
नीपर नदी के पूर्व का 3,36,300 वर्ग किमी क्षेत्र यानी यूक्रेन का लगभग 55% हिस्सा रूस में मिलाना। इसका सीधा मतलब होगा कि यूक्रेन दो भागों में बंट जाएगा।
- पूर्वी हिस्सा रूस के कब्जे में जाएगा।
- पश्चिमी हिस्सा कमजोर “बफर स्टेट” बनकर रह जाएगा।
अमेरिका को “पीस डील” में फंसाकर पुतिन ने कथित तौर पर 28 पॉइंट प्लान तैयार किया है। आरोप है कि ट्रंप का पीस प्लान असल में पुतिन को फायदा पहुंचा रहा है। इसके तहत रूस को लुहान्स्क और डोनेट्स्क का पूरा हिस्सा मिल सकता है, जबकि खेरसॉन और जापोरिज्जिया की मौजूदा फ्रंटलाइन को फ्रीज किया जा सकता है।
इसके साथ ही पुतिन यूक्रेन को निहत्था करने की शर्त भी थोप सकते हैं-
- यूक्रेनी सेना का आकार घटाना
- लंबी दूरी के हथियारों पर बैन
- क्रीमिया और डोनबास को रूस का हिस्सा मानना
हालांकि NATO इस पर सहमत नहीं है। अमेरिका और यूरोपीय देश यूक्रेन को अनुच्छेद-5 जैसी सुरक्षा गारंटी देना चाहते हैं, लेकिन उसे नाटो का औपचारिक सदस्य नहीं बनाना चाहते।
जेलेंस्की के सामने विकल्प बेहद सीमित हैं। वे मान चुके हैं कि रूस की बात मानने का मतलब है
“या तो गरिमा खो दो, या अमेरिका खो दो।”
अगर मानते हैं तो देश बंटेगा, नहीं मानते तो अमेरिकी मदद बंद हो सकती है। यही स्थिति पुतिन के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक जीत मानी जा रही है, क्योंकि उनका अगला बड़ा लक्ष्य यूरोप बताया जा रहा है।
पुतिन की लिस्ट में “कई और यूक्रेन”
यूरोपीय देशों को डर है कि पुतिन का अगला मास्टर प्लान 2029 के लिए तैयार है। आशंका है कि रूस बाल्टिक देशों एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया पर सीधा सैन्य दबाव बना सकता है।
इसके अलावा फिनलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, रोमानिया, मोल्दोवा और जॉर्जिया में तख्तापलट या रूस समर्थक सरकारें बनाने की कोशिश हो सकती है।
अमेरिका पहले भी कह चुका है कि पुतिन “यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ सोवियत रशियन” यानी पुराने USSR जैसी व्यवस्था फिर से बनाना चाहते हैं। इसमें सोवियत संघ से अलग हुए 7 देशों।
आर्मेनिया, जॉर्जिया, अजरबैजान, कजाखिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और किर्गिजस्तान पर प्रभाव बढ़ाने की चर्चा होती रही है।
रूस के डर से बाल्टिक देश सीमाओं पर 600 से ज्यादा बंकर और एंटी-टैंक खाइयां बना रहे हैं।
मौजूदा समय में ट्रंप की सबसे बड़ी मजबूरी किसी भी तरह युद्ध रोकना मानी जा रही है। ऐसे में उन्हें पुतिन की कुछ शर्तें माननी पड़ सकती हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो युद्ध लंबा खिंच सकता है और वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं।
यूरोप में बढ़ती दरार
पुतिन के मास्टर प्लान का असर अब यूरोप की राजनीति में भी दिखने लगा है। यूरोपीय देशों को लग रहा है कि ट्रंप धीरे-धीरे NATO से दूरी बना रहे हैं।
वहीं फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम जैसे देश रूस के खिलाफ सख्त रुख चाहते हैं। यूरोपीय देशों को डर है कि यूक्रेन के बाद उनकी बारी आ सकती है।
पुतिन पहले ही कह चुके हैं
“कीव और यूरोप भ्रम में न रहें, रूस उनका हाल बेहाल करके ही दम लेगा।”






