Sabarimala Verdict Review: केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में सुनवाई तेज हो गई है। इस बहुचर्चित मामले की सुनवाई के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने 9 जजों की संविधान पीठ गठित की है, जो नियमित रूप से इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई कर रही है। इस सुनवाई को धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और न्यायपालिका की सीमाओं से जुड़े बड़े संवैधानिक प्रश्नों के कारण ऐतिहासिक माना जा रहा है।
‘महिला को तीन दिन अछूत मानना प्रथा नहीं हो सकती’
सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी महिला को हर महीने तीन दिनों के लिए ‘अछूत’ मानना किसी धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि एक महिला के रूप में वह यह नहीं समझ पा रहीं कि कैसे किसी महिला को कुछ दिनों के लिए अछूत माना जा सकता है और चौथे दिन सब सामान्य हो जाए। कोर्ट की यह टिप्पणी सुनवाई का सबसे चर्चित बिंदु बन गई।
केंद्र सरकार ने रखा पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Tushar Mehta) ने अदालत में पक्ष रखते हुए कहा कि वे किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं कर रहे, बल्कि केवल संवैधानिक और कानूनी आधार पर अपनी दलीलें पेश कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध मासिक धर्म से नहीं जुड़ा है, बल्कि यह केवल 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं पर लागू विशेष परंपरा है।
भगवान अयप्पा की परंपरा का हवाला
तुषार मेहता ने कहा कि सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ स्वरूप में पूजा जाता है और महिलाओं के एक आयु वर्ग के प्रवेश पर रोक इसी धार्मिक मान्यता से जुड़ी है। उन्होंने अदालत को बताया कि भगवान अयप्पा के अन्य मंदिरों में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति है, इसलिए यह मामला केवल एक विशेष मंदिर से जुड़ा ‘विशिष्ट’ मामला है।
हिंदू धर्म की बहुलता पर जोर
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने हिंदू धर्म की बहुलतावादी प्रकृति पर जोर देते हुए कहा कि हिंदू धर्म एक व्यापक जीवन पद्धति है, जिसमें अनेक परंपराएं, दर्शन और मान्यताएं शामिल हैं। तुषार मेहता ने कहा कि हिंदू धर्म में अलग-अलग संप्रदायों और धार्मिक प्रथाओं को समझे बिना किसी एक मानक से सभी मामलों का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
न्यायिक समीक्षा की सीमा पर बहस
अदालत में यह भी बहस हुई कि क्या न्यायपालिका धार्मिक प्रथाओं की ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ (Essential Religious Practice) तय कर सकती है। केंद्र सरकार ने कहा कि धार्मिक मामलों में डॉक्ट्रिनल और इंटरप्रिटेशन डिफरेंसेज होते हैं, जिन्हें समझने के लिए विशेष धार्मिक ज्ञान चाहिए, इसलिए न्यायिक समीक्षा की भी एक सीमा होनी चाहिए।
2018 के फैसले पर पुनर्विचार
गौरतलब है कि वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह प्रतिबंध महिलाओं के समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। इस फैसले के खिलाफ 67 पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई थीं, जिन पर अब 9 जजों की बेंच सुनवाई कर रही है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल संविधान पीठ धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता के अधिकार, न्यायिक समीक्षा की सीमा और आवश्यक धार्मिक प्रथा जैसे व्यापक संवैधानिक सवालों पर विचार कर रही है। अंतिम निर्णय के बाद यह तय होगा कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर अंतिम व्यवस्था क्या होगी। माना जा रहा है कि इस फैसले का प्रभाव आने वाले दशकों तक देश के धार्मिक और संवैधानिक विमर्श पर पड़ेगा।







