Akhilesh Yadav vs Smriti Irani: संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे अहम मुद्दों पर चल रही बहस के बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) और भाजपा की वरिष्ठ नेता स्मृति ईरानी (Smriti Irani) के बीच तीखी जुबानी जंग छिड़ गई है। ‘सास-बहू’ वाले बयान से शुरू हुआ यह विवाद अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल गया है।
क्या था मामला?
लोकसभा में चर्चा के दौरान अखिलेश यादव ने बिना नाम लिए तंज कसते हुए कहा,
“वो सास-बहू वाली तो हार गई…”।
उनका इशारा स्मृति ईरानी की ओर माना गया, जो टीवी शो ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ से लोकप्रिय रही हैं। इस बयान के जरिए उन्होंने भाजपा की महिला नीति पर सवाल उठाए।
स्मृति ईरानी का तीखा जवाब
इस टिप्पणी पर स्मृति ईरानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर तीखा पलटवार करते हुए लिखा,
“सुना है आज अखिलेश जी ने संसद में मुझे याद किया…”। उन्होंने आगे कहा, “कामकाजी औरत पर वे टिप्पणी करते हैं, जिन्होंने जिंदगी में कभी कोई नौकरी नहीं की…” और नसीहत दी, “सीरियल से हटाकर संसद पर ध्यान लगाएं और महिलाओं के लिए अहम बिल पास कराएं…”।
इस बयान के जरिए ईरानी ने ‘परिवारवाद’ बनाम ‘स्वनिर्मित नेतृत्व’ का मुद्दा भी उठाया।
https://x.com/i/status/2044752940410552555
भाजपा पर अखिलेश का हमला
अखिलेश यादव ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी ‘नारी’ को सिर्फ एक नारे के रूप में इस्तेमाल करती है, जबकि हकीकत में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देती।
उन्होंने आरोप लगाया कि 21 राज्यों में सरकार होने के बावजूद महिला मुख्यमंत्रियों की संख्या बेहद कम है और भाजपा विधायकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से भी नीचे है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब पार्टी अपने ही संगठन और सत्ता ढांचे में महिलाओं को उचित स्थान नहीं दे पा रही है, तो वह महिलाओं के अधिकारों और सशक्तिकरण की बात कैसे कर सकती है।
बड़ा मुद्दा क्या है?
यह विवाद केवल व्यक्तिगत टिप्पणी तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण और वास्तविक सशक्तिकरण जैसे बड़े मुद्दों को भी सामने ला रहा है। जहां एक ओर भाजपा महिला सशक्तिकरण के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का दावा करती है, वहीं विपक्ष इसे जमीनी हकीकत से दूर बताता है।
‘सास-बहू’ टिप्पणी से शुरू हुई यह सियासी तकरार अब संसद से लेकर सोशल मीडिया तक छा गई है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह बहस सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहती है या महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर कोई ठोस राजनीतिक कदम भी सामने आता है।







